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माँ का प्यार Maa Ka Pyar

ज़िन्दगी life में कुछ एहसास ऐसे होते है जिनकी बेपनाह मिठास और गर्माहट को महसूस feel करने के लिए बेहद जरुरी होता है कि हम खुद उन अनुभवों experience से गुज़रे जिन अनुभवों experience से वो एहसास पनपते हैं…. मुझे याद है कि बचपन में जब भी घर से स्कूल school या
कहीं बाहर घूमने जाता था तो माँ Maa की तरफ से बाकायदा ढेर सारी हिदायतें instructions मिलती थी कि बेटा, पहुँचते ही घर पर फ़ोन करके इत्तिला कर देना ..वहां ध्यान से सड़क पार करना, खाना टाइम time से खा लेना .अच्छे से अपना ध्यान रखना वगैरह वगैरह ………

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घर से निकलते वक़्त time जहाँ बहुते बार माँ Maa को अपना ध्यान रखने का आश्वासन देकर रुखसत होता था तो कई बार गुस्से भरी झुंझुलाहट और कोफ़्त भी होती थी कि मम्मीजी भी मुझे बस छोटा बच्चा ही समझती हैं..भई, मुझे आता है अब अपना ध्यान रखना…वहीँ नसीहतें instructions बार बार दोहराने का क्या तुक…….खैर, मुझे नहीं याद कि माँ Maa ने कभी मेरी झुंझुलाहट का गुस्सा किया हो…..माएं तो खैर होती ही ऐसी हैं…..प्यारी और बेहद अच्छी….

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आज जब बेटा नमह दिन भर अपनी नटखट शरारतों mischiefs से मुझे अपने पीछे दौड़ाता है और मेरे मुंह से भी नमह के लिए कमोबेश वहीँ अलफ़ाज़ words निकलते हैं जिन अल्फ़ाज़ों words के जरिये मेरी माँ मेरे लिए अपना प्यार और फ़िक्र love or care जाहिर करती थी तो शिद्दत से महसूस feel कर पाता हूँ अपनी माँ maa का मेरे लिए स्नेह affection , फ़िक्र care और अपनापन ..घर से बाजार market या कहीं बाहर जाते वक़्त जब बार बार खुद को और दूसरों को यह ताक़ीद करता हूँ कि नमह का हाथ थामे रखना है और इसे हर वक़्त नज़रों के सामने रखना है तो यकायक माँ maa द्वारा मेरी फ़िक्र care करने से जुड़ी बातें जेहन heart में दस्तक देने लगती हैं…आज जब कॉलेज college के लिए निकलते वक़्त time जब माँ maa मुझे वहीँ बचपन वाली हिदायतें instructions देती हैं तो मैं ना तो झुंझलाता हूँ और ना भूले से कभी माँ की बात पर गुस्सा होता हूँ क्योंकि खुद एक बेटे का बाप बनने के बाद माँ-बाप parents द्वारा दिखाए जा रहे इस फ़िक्र और स्नेह care or affection की अहमियत importance मैं पहले से कहीं बेहतर समझता हूँ….शायद कुछ बातों की अहमियत हम वक़्त time के साथ ही समझ पाते हैं… माँ की नमह के साथ शरारतें और अठखेलियां देखकर जहाँ एक तरफ मुझे ऐसा लगता है मानो मेरी माँ अपने पोते के साथ एक बार फिर अपने बचपन को जी रही है, वहीँ इस ख़ुशी happiness से दादी-पोते के चेहरों पर उपजी मासूमियत मुझे भी एक सुकून का एहसास दे जाती है…

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याद आते हैं मुन्नवर राणा MUNNVAR RANA के वो कालजयी शब्द ,
‘उछलते खेलते बचपन में बेटा ढूंढती होगी,
तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है’……………..
LOve You Both

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अजय खोसला सर

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