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कोहिनूर का परिचय :-

ये दुनिया कई बहुमूल्य हीरो से भरी पड़ी है । जिन हीरो में एक हीरा है कोहिनूर kohenoor जो आज भी अपनी श्रेष्ठता कायम किये हुए है ।

जिस का साहित्यक अर्थ है – प्रकाश का पहाड़ Mountain of Light ।

Kohinoor हीरा अपने वज़ूद से लेकर आज तक अभिशप्त माना जाता रहा और कई राजाओ-महाराजाओ के पतन तथा तख्ता पलट का कारण बनता रहा ।

【 कहा जाता है कि स्यमन्तक मणि के रूप में जाने जाने वाले इस बेशकीमती पत्थर ने भगवान श्री कृष्ण तक पर चोरी का कलंक लगवाया था । 】

इसकी कीमत और आकर्षण का अंदाज़ा मुगल शासक बाबर के उस उक्ति से लगाया जा सकता है , जिसमे कहा था – ‘ इसकी कीमत से पूरी दुनिया 2 दिनों तक भरपेट भोजन कर सकती है ।’

History of Kohinoor Diamond

कोहिनूर हीरे का इतिहास :-

यह हीरा गोलकुंडा Golkunda से 45 मील आगे कोहलोर Kohlor की खानो में से निकला था । इस समय यह मुर्गी के छोटे अंडे के सामान था । इस हीरे का जिक्र रामायण Ramayana में भी मिलता है पर उस समय इसको यह कोहिनूर Kohinoor नाम नहीं मिला था ।

सन् 1309-10 ई. अलाउदीन ख़िलजी Alauddin Kheelji के सेनापति मलिक काफूर Malik Kaphur ने दक्षिण के राज वारंगल के राजा प्रताप रुद्रदेव Pratap Warangal तीसरे से अधीनता के तोर पर लिया था ।

राजनितिक अशांति के कारण लंबे समय तक ये अलोप रहा । जब बाबर ने 1526 ई. में पानीपत Panipat की लड़ाई में दिल्ली के अफ़ग़ान शासक इब्राहिम लोधी को हराया और अपने बेटे हुमायूँ Humayu को आगरा पर कब्ज़ा करने के लिए भेज आगरा में एक बुढी औरत से उसको प्राप्त हुआ ।
हुमायूँ ने यह अपने पिता बाबर Babar को भेंट किया । बाबर ने खुश होकर यह हीरा दुबारा हुमायूँ Humayu को वापस दे दिया । हुमायूँ 1540 ई में युद्ध में हार के कारण भारत से ईरान चला गया । कुछ समय तक ही यह हीरा मुगलों के कब्ज़े में  न रहा ।

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17वी सदी में जब गोलकुंडा Golkunda के राजा ने यह हीरा मुग़ल बादशाह शाहजहाँ
Shahjahan को भेंट किया । सन् 1739 ई में अफगानिस्तान Afganistan के शासक नादर शाह Nadar shah ने दिल्ली Delhi को लूटा  और हीरे को अपने कब्ज़े में लिया इस हीरे की खूबसूरती देख के उसने इसे कोहिनूर Kohinoor का नाम दिया । नादर शाह से आगे यह हीरा अहमद अब्दाली Abdalli तक और उस से आगे उसके पोते शाह सुजाह तक पहुंचा ।

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अफगानिस्तान Afganistan की राजनितिक अशांति का फायदा उठा के कश्मीर के गवनर अत्ता मुहम्मद खां ने शाह सुजाह को बन्दी बना लिया पर उसकी बेगमो को सिख़ो ने बचा लिया और लाहौर Lahore दरबार में सुरक्षा प्रदान की ।

शाह सुजाह की पत्नी वफा बेगम Waffa Begum ने अपने पति की आज़ादी के बदले महाराजा रणजीत सिंह Maharaja Ranjeet Singh को यह हीरा देने का वचन दिया । महाराजा ने सन् 1813 ई. में कश्मीर Kashmir पर हमला किया भले ही कश्मीर को जीत न सका पर शाह सुजाह उस को मिल गया और वफा बेगम ने यह हीरा महाराजा को आभार हेतु भेंट किया ।

लम्बे समय तक यह हीरा खालसा Khalsa दरबार की शान बना रहा । महाराजा ने कोहिनूर Kohinoor को अपने बाजूबन्द के दो कीमती हीरो के बीच में लगवाया । सन् 1849 ई को अंग्रेजो ने पंजाब Punjab पर हमला करके इस हीरे को अपने कब्ज़े में ले लिया । 1851 ई में लंदन के हाईड पार्क में जनता को यह हीरा दिखाया गया ।

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यह हीरा इंग्लेंड England की महारानी विक्टोरिया Victoria को भेंट किया गया । 1936 में यह हीरा महारानी एलिजाबेथ के मुकुट की शोभा बना । 2007 तक कोहिनूर Tower of London में ही रखा गया । आज भी यह हीरा कीमत वजन और चमक के कारण बहुमूल्य है । महाराजा के समय अंग्रेज लेखको ने इसकी कीमत 30 लाख पोंड लगाई थी आज भी संसार में
इसके बराबर का कोई हीरा नहीं है ।

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यही kohinoor अब एक बार फिर चर्चा में आ गया है । कुछ दिन पहले पाकिस्तान के वकील जावेद इकबाल जाफरी ने लाहौर हाइकोर्ट  में याचिका दायर कर लंदन
से अपने मुल्क की दावेदारी जताई थी और अब महाराजा रणजीत सिंह के वंशजो ने एकजुट होकर दोबारा इसे हासिल करने की लड़ाई शुरू कर दी है । महाराजा के वंशजो में शुमार सन्धावालिया तथा सुक्रचकिया परिवारों ने ब्रिटिश पीएम तथा एम्बेसी को लैटर लिखकर इसे भारत को
सौंपने की बात कही है ।

कोहिनूर के बारे में खास बातें :-

” महारानी विक्टोरिया को इस हीरे के श्राप के बारे में बताया गया तो उन्होंने हीरे को ताज़ में जुड़वा कर 1852 में स्वयं पहनती है और यह वसीयत करती है की इस ताज को सदैव महिला ही पहनेगी ।यदि कोई पुरष ब्रिटेन का राजा बनता है तो यह ताज उसकी जगह उसकी पत्नी इसे पहनेगी ।”

“इतिहासकारो का मानना है कि महिला दुवारा धारण करने के बावजूद इसका असर खत्म नहीं हुआ और ब्रिटेन के साम्राज्य के अंत के लिए भी यही जिम्मेदार है ।
ब्रिटेन 1850 तक आधे विश्व पर राज कर रहा था
पर उसके बाद उसके अधीनस्थ देश एक एक करके स्वतन्त्र हो गए ।”

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